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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
ते दुर्गवासं वहुधा निरुष्य; व्यतीत्य कैलासमचिन्त्यरूपम् |  ६   क
आसेदुरत्यर्थमनोरमं वै; तमाश्रमाग्र्यं वृषपर्वणस्ते ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति