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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
समुच्छ्रितमहाकाय़ो द्वितीय़ इव पर्वतः |  ५   क
ताम्रेक्षणस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भृकुटीकृतलोचनः |  ५   ख
दीर्घलाङ्गूलमाविध्य दिशो व्याप्य स्थितः कपिः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति