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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं सेन्द्रं जगत्सर्वं श्वेतपर्वतसंस्थितम् |  २७   क
प्रहृष्टं प्रेक्षते स्कन्दं न च ग्लाय़ति दर्शनात् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति