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अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
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व्यास उवाच
न द्रुह्येन्मनसा चापि गोषु ता हि सुखप्रदाः |  ३३   क
अर्चय़ेत सदा चैव नमस्कारैश्च पूजय़ेत् |  ३३   ख
दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति