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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह |  ३४   क
वीजान्यादाय़ सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा |  ३४   ख
नावा तु शुभय़ा वीर महोर्मिणमरिन्दम ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति