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अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
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भीष्म उवाच
तस्मात्पार्थ त्वमपीमां मय़ोक्तां; वार्हस्पतीं भारतीं धारय़स्व |  २८   क
द्विजाग्र्येभ्यः सम्प्रय़च्छ प्रतीतो; गाः पुण्या वै प्राप्य राज्यं कुरूणाम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति