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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
वीरं हि क्षत्रिय़ं हत्वा गोशतेन प्रमुच्यते |  २०   क
पितरं तु निहत्यैवं दुस्तरा निष्कृतिर्मय़ा ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति