आदि पर्व  अध्याय ३२

सूत उवाच

तथेति कृत्वा विवरं प्रविश्य स; प्रभुर्भुवो भुजगवराग्रजः स्थितः |  २२   क
विभर्ति देवीं शिरसा महीमिमां; समुद्रनेमिं परिगृह्य सर्वतः ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति