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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
निहन्तारं रणेऽरीणां सर्वशस्त्रभृतां वरम् |  ४   क
मय़ा विनिहतं सङ्ख्ये प्रेक्षते दुर्मरं वत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति