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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मरं पुरुषेणेह मन्ये ह्यध्वन्यनागते |  ६   क
यत्र नाहं न मे माता विप्रय़ुज्येत जीवितात् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति