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वन पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणं यः कुरुते पृथिवीं तीर्थतत्परः |  १०   क
किं फलं तस्य कार्त्स्न्येन तद्व्रह्मन्वक्तुमर्हसि ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति