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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत धर्मज्ञ विमलं तीर्थमुत्तमम् |  १०३   क
अद्यापि यत्र दृश्यन्ते मत्स्याः सौवर्णराजताः ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति