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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत मलदां त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् |  १०५   क
पश्चिमाय़ां तु सन्ध्याय़ामुपस्पृश्य यथाविधि ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति