वन पर्व  अध्याय ८०

नारद उवाच

शृणु राजन्नवहितो यथा भीष्मेण भारत |  ११   क
पुलस्त्यस्य सकाशाद्वै सर्वमेतदुपश्रुतम् ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति