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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
त्रिशूलपाणेः स्थानं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |  १११   क
देविकाय़ां नरः स्नात्वा समभ्यर्च्य महेश्वरम् ||  १११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति