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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
यथाशक्ति चरुं तत्र निवेद्य भरतर्षभ |  ११२   क
सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य लभते फलम् ||  ११२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति