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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
कामाख्यं तत्र रुद्रस्य तीर्थं देवर्षिसेवितम् |  ११३   क
तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं सिद्धिमाप्नोति भारत ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति