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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
यजनं याजनं गत्वा तथैव व्रह्मवालुकाम् |  ११४   क
पुष्पन्यास उपस्पृश्य न शोचेन्मरणं ततः ||  ११४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति