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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत धर्मज्ञ दीर्घसत्रं यथाक्रमम् |  ११६   क
यत्र व्रह्मादय़ो देवाः सिद्धाश्च परमर्षय़ः |  ११६   ख
दीर्घसत्रमुपासन्ते दक्षिणाभिर्यतव्रताः ||  ११६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति