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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
नागोद्भेदे नरः स्नात्वा नागलोकमवाप्नुय़ात् |  १२०   क
शशय़ानं च राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् |  १२०   ख
शशरूपप्रतिच्छन्नाः पुष्करा यत्र भारत ||  १२०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति