वन पर्व  अध्याय ८०

पुलस्त्य उवाच

सरस्वत्यां महाराज अनु संवत्सरं हि ते |  १२१   क
स्नाय़न्ते भरतश्रेष्ठ वृत्तां वै कार्त्तिकीं सदा ||  १२१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति