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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
कुमारकोटिमासाद्य निय़तः कुरुनन्दन |  १२३   क
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः |  १२३   ख
गवामय़मवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ||  १२३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति