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वन पर्व
अध्याय २११
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मार्कण्डेय़ उवाच
मृतः श्रूय़ेत यो जीवन्परेय़ुः पशवो यथा |  २८   क
इष्टिरष्टाकपालेन कर्तव्याभिमतेऽग्नय़े ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति