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शान्ति पर्व
अध्याय २३७
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व्यास उवाच
तद्भवानेवमभ्यस्य वर्ततां श्रूय़तां तथा |  ४   क
एक एव चरेन्नित्यं सिद्ध्यर्थमसहाय़वान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति