वन पर्व  अध्याय ८०

पुलस्त्य उवाच

अमोघदर्शी भीष्माहं व्रूहि किं करवाणि ते |  २४   क
यद्वक्ष्यसि कुरुश्रेष्ठ तस्य दातास्मि तेऽनघ ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति