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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
प्रतिग्रहादुपावृत्तः सन्तुष्टो निय़तः शुचिः |  ३१   क
अहङ्कारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति