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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
अकल्कको निरारम्भो लघ्वाहारो जितेन्द्रिय़ः |  ३२   क
विमुक्तः सर्वदोषैर्यः स तीर्थफलमश्नुते ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति