वन पर्व  अध्याय ८०

पुलस्त्य उवाच

प्राप्यन्ते पार्थिवैरेते समृद्धैर्वा नरैः क्वचित् |  ३६   क
नार्थन्यूनोपकरणैरेकात्मभिरसंहतैः ||  ३६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति