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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम |  ३८   क
तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति