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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
जन्मप्रभृति यत्पापं स्त्रिय़ो वा पुरुषस्य वा |  ५४   क
पुष्करे स्नातमात्रस्य सर्वमेव प्रणश्यति ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति