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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
यथा सुराणां सर्वेषामादिस्तु मधुसूदनः |  ५५   क
तथैव पुष्करं राजंस्तीर्थानामादिरुच्यते ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति