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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
शाकवृत्तिः फलैर्वापि कौमारं विन्दते पदम् |  ६४   क
कण्वाश्रमं समासाद्य श्रीजुष्टं लोकपूजितम् ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति