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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
अर्चय़ित्वा पितॄन्देवान्निय़तो निय़ताशनः |  ६६   क
सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति