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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणं ततः कृत्वा यय़ातिपतनं व्रजेत् |  ६७   क
हय़मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति तत्र वै ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति