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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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शुक्र उवाच
देवाः प्रीणन्ति सततं मानिता मानय़न्ति च |  ३६   क
अवज्ञातावधूताश्च निर्दहन्त्यधमान्नरान् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति