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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
चर्मण्वतीं समासाद्य निय़तो निय़ताशनः |  ७३   क
रन्तिदेवाभ्यनुज्ञातो अग्निष्टोमफलं लभेत् ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति