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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः |  ७५   क
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति