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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत धर्मज्ञ प्रभासं लोकविश्रुतम् |  ७७   क
यत्र संनिहितो नित्यं स्वय़मेव हुताशनः |  ७७   ख
देवतानां मुखं वीर अनलोऽनिलसारथिः ||  ७७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति