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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
सागरस्य च सिन्धोश्च सङ्गमं प्राप्य भारत |  ८५   क
तीर्थे सलिलराजस्य स्नात्वा प्रय़तमानसः ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति