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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ |  ८८   क
तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |  ८८   ख
दृमीति नाम्ना विख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ||  ८८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति