वन पर्व  अध्याय ८०

वैशम्पाय़न उवाच

यदि त्वहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ |  ९   क
सन्देहं मे मुनिश्रेष्ठ हृदिस्थं छेत्तुमर्हसि ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति