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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
तीर्थं चात्र परं पुण्यं वसूनां भरतर्षभ |  ९४   क
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च वसूनां संमतो भवेत् ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति