वन पर्व  अध्याय ८०

पुलस्त्य उवाच

व्रह्मतुङ्गं समासाद्य शुचिः प्रय़तमानसः |  ९६   क
व्रह्मलोकमवाप्नोति सुकृती विरजा नरः ||  ९६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति