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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
रेणुकाय़ाश्च तत्रैव तीर्थं देवनिषेवितम् |  ९८   क
तत्र स्नात्वा भवेद्विप्रो विमलश्चन्द्रमा यथा ||  ९८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति