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उद्योग पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ेण हि हन्तव्यः क्षत्रिय़ो लोभमास्थितः |  १६   क
अक्षत्रिय़ो वा दाशार्ह स्वधर्ममनुतिष्ठता ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति