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उद्योग पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं ते पुण्डरीकाक्ष दुःशासनकरोद्धृतः |  ३६   क
स्मर्तव्यः सर्वकालेषु परेषां सन्धिमिच्छता ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति