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उद्योग पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण सामात्येन जनार्दन |  ५   क
यथा च सञ्जय़ो राज्ञा मन्त्रं रहसि श्रावितः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति