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भीष्म पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
ऋषय़श्चैव देवाश्च चक्रुः स्वस्त्ययनं महत् |  ११   क
लोकानां नृप शान्त्यर्थं क्रोधिते पाण्डवे तदा ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति