वन पर्व  अध्याय २३

वासुदेव उवाच

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रगृह्य रुचिरं धनुः |  १   क
शरैरपातय़ं सौभाच्छिरांसि विवुधद्विषाम् ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति