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भीष्म पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा दृष्ट्वा राज्ञस्तु पौरुषम् |  १७   क
विप्रदुद्राव वेगेन श्रुताय़ुः समरे तदा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति